गुरुवार, 24 अगस्त 2017

'समकालीन सरोकार और साहित्य' लोकार्पित



हैदराबाद, 20 अगस्त,2017. 

कादंबिनी क्लब-हैदराबाद एवं साहित्य मंथन के संयुक्त तत्वावधान में रविवार, 20 अगस्त को हिंदी प्रचार सभा, नामपल्ली परिसर में क्लब की 301वीं गोष्ठी एवं पुस्तक लोकार्पण समारोह अरबामिंच विश्वविद्यालय, इथियोपिया के आचार्य डा० गोपाल शर्मा की अध्यक्षता में संपन्न हुआ .क्लब की अध्यक्ष डा० अहिल्या मिश्र एवं कार्यकारी संयोजक मीना मुथा ने प्रेस विज्ञप्ति में बताया कि इस अवसर पर मुख्य अतिथि कानपुर से पधारे वरिष्ठ गीतकार बृजनाथ श्रीवास्तव और अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय के पूर्व आचार्य डा० एम० वेंकटेश्वर के साथ डा० अहिल्या मिश्र और डा० ऋषभदेव शर्मा मंचासीन हुए. संचालन प्रवीण प्रणव और मीना मुथा ने किया.

समारोह के पहले सत्र में मंचासीन अतिथियों ने तालियों की गूँज के बीच ‘पुष्पक’ के पैंतीसवें अंक को लोकार्पित किया. विमोचित पत्रिका का परिचय देते हुए कार्यकारी संपादक अवधेश कुमार सिन्हा ने कहा कि हर बढ़ते अंक से साथ ‘पुष्पक’ अधिक से अधिक पाठकों तक अपनी पहुँच बना रहा है तथा स्थानीय रचनाकारों के साथ-साथ भारत भर से सशक्त रचनाएँ प्राप्त हो रही हैं. संपादकीय को ‘पुष्पक’ की विशेषता बताते हुए उन्होंने कहा कि कहानी, गीत, कविता, ग़ज़ल, संस्मरण, समीक्षा, लघु कथा, आलेख, पुस्तक परिचय आदि विधाओं में बेहतरीन रचनाओं का चुनाव संपादक मंडल की दूरदृष्टि का परिचायक है.

दूसरे सत्र में डा० ऋषभदेव शर्मा एवं डा० जी० नीरजा द्वारा संपादित पुस्तक ‘समकालीन सरोकार और साहित्य’ को मुख्य अतिथि प्रो० एम० वेंकटेश्वर ने लोकार्पित किया. लोकार्पण वक्तव्य में डा० एम० वेंकटेश्वर ने कहा कि साहित्य जटिल अनुशासन है तो शोधपरक लेखन जटिलतर है. उन्होंने अध्यापकों और शोधार्थियों से लेकर सामान्य जनता तक में स्वाध्याय की प्रवृत्ति के अकाल पर चिंता जताते हुए कहा कि साहित्य कभी चलकर मनुष्य के पास नहीं जाएगा, हमें मनुष्य को साहित्य के पास जाने को प्रेरित करते रहना पड़ेगा. उन्होंने विमोचित पुस्तक से कई लेखों का उद्धरण देते हुए उनकी गुणवत्ता की चर्चा की और उसे न सिर्फ शोधार्थियों के लिए बल्कि सभी साहित्य प्रेमियों के किए पठनीय और संग्रहणीय बताया. साथ ही उन्होंने संपादकों की अति उदारता की आलोचना करते हुए उन्हें चयन में निर्मम होने की सलाह भी दी. 
लोकार्पित पुस्तक की प्रथम प्रति डा० अहिल्या मिश्र को उनकी सप्ततिपूर्ति की पूर्ववेला के उपलक्ष्य में समर्पित की गई. हिंदी साहित्य सेवा में तन-मन-धन से समर्पित वरिष्ठ स्त्रीविमर्शकार लेखिका, नाटककार, कहानीकार, कवयित्री, निबंधकार और संपादक डा० अहिल्या मिश्र को जीवन के 70वें वर्ष के पायदान पर शुभकामनाएँ देते हुए ‘साहित्य मंथन’ की ओर से सारस्वत सम्मान से अलंकृत किया गया. इसके अंतर्गत अभिनंदन पत्र, शाल, माला, श्रीफल, लेखनी और पुस्तक समर्पित की गई. अभिनंदन पत्र एवं समर्पण वाक्य का वाचन डा० ऋषभदेव शर्मा ने किया.
डा० अहिल्या मिश्र ने सम्मान-स्वीकृति-वक्तव्य में कहा कि कादंबिनी क्लब की यह 301वीं गोष्ठी अविस्मरणीय रहेगी. उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि ‘साहित्य मंथन’ के बहाने समशील साहित्यिक बिरादरी ने आज जो सम्मान दिया है, इसमें निहित प्रेम में सारे कलुष और ताप को हरने की शक्ति है अतः मैं इस आत्मीय अभिनंदन को शिरोधार्य करती हूँ. बृजनाथ श्रीवास्तव एवं अन्य वक्ताओं ने डा० अहिल्या मिश्र को बधाई देते हुए कहा कि वे सही अर्थ में साहित्य और सारस्वत वातावरण की सूत्रधार हैं.
डा० गोपाल शर्मा ने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि अंग्रेजी और विश्व की अन्य भाषाओं में शोधलेखन में संदर्भ देने की शैलियों पर अनेक पुस्तकें हैं लेकिन हिंदी में इस तरह की कोई प्रामाणिक पुस्तक नहीं है अतः लोकार्पित पुस्तक में इस अभाव की पूर्ति का भी एक विनम्र प्रयास शामिल है. उन्होंने याद दिलाया कि इस पुस्तक में स्थानीय व राष्ट्रीय लेखकों के 30 शोधपरक आलेख शामिल हैं. उन्होंने शोधार्थियों से कहा कि शोधपत्र लिखने से पहले विषय की विस्तृत समझ के लिए ज्यादा से ज्यादा साहित्यकारों को पढ़ें. इसके बाद सहयोगी लेखकों को पुस्तक की लेखकीय प्रतियाँ भेंट की गईं.

आरंभ में शहर के वरिष्ठ पत्रकार, कर्मठ सामाजिक कार्यकर्ता, हिंदी साहित्यसेवी डा० हरिश्चंद्र विद्यार्थी के दुखद निधन पर मौन रखकर श्रद्धांजलि अर्पित की गई. शुभ्रा मोहंतो द्वारा सस्वर प्रस्तुत निराला रचित सरस्वती वंदना के पश्चात अतिथियों का स्वागत करते हुए डा० अहिल्या मिश्र ने कहा कि गोष्ठी की निरंतरता सदस्यों की नियमित उपस्थिति से ही संभव हुई है तथा संस्था हिंदी साहित्य की सेवा, प्रचार-प्रसार में पूर्ण समर्पण से कार्य कर रही है.

अंतिम सत्र में भँवरलाल उपाध्याय के संचालन में कवि गोष्ठी संपन्न हुई. बृजनाथ श्रीवास्तव, प्रो० गोपाल शर्मा, डा० ऋषभदेव शर्मा और डा० अहिल्या मिश्र मंचासीन हुए. देवाप्रसाद मायला, शशि राय, ज्योति नारायण, डा० बी० बालाजी, दीपक दीक्षित, मिलन बिश्नोई, संतोष कुमार रज़ा, डा० ऋषभदेव शर्मा, डा० अहिल्या मिश्र, एल० रंजना, दर्शन सिंह, सरिता सुराणा जैन, डा० गीता जांगिड़, प्रवीण प्रणव, चिराग राजा, अवधेश कुमार सिन्हा, श्रीमन्नारायण विराट चारी, मीना मुथा, भँवरलाल उपाध्याय और डा० रियाजुल अंसारी ने काव्य पाठ किया. बृजनाथ श्रीवास्तव ने अध्यक्षीय काव्यपाठ किया. डा० मदनदेवी पोकरणा, डा० सीता मिश्र, कुंजबिहारी गुप्ता, दयालचंद अग्रवाल, लक्ष्मी निवास शर्मा, ज्योतिष कुमार यादव, आशा मिश्र, श्रीसेन कुमार भारती, चेन्नकेशव रेड्डी, शिवकुमार तिवारी कोहिर, राघवेंद्र, शोभा महाबल, डा० सिरिपुरपु तुलसी देवी, श्रुतिकांत भारती, लीला बजाज, वर्षा कुमारी, डा० श्रद्धा तिवारी, डा० सुपर्णा मुखर्जी, टी० निरंजन, बनवारीलाल मीणा, भूपेंद्र मिश्र आदि की उपस्थिति रही.  मीना मुथा के आभार के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ.

बुधवार, 12 जुलाई 2017

(निमंत्रण) मुक्तिबोध जन्मशती पर प्रकाशित "अँधेरे में : पुनर्पाठ" का लोकार्पण 16 जुलाई को

'अँधेरे में'' : पुनर्पाठ/ (सं) ऋषभ देव शर्मा, गुर्रमकोंडा नीरजा
परिलेख प्रकाशन, नजीबाबाद
2017, पृष्ठ 224, मूल्य : 250/- 
ISBN : 978-93-84068-54-7
वितरक : srisahitiprakashan@yahoo.com
हैदराबाद।16 जुलाई, 2017 (रविवार) को दोपहर 12 बजे हिंदी प्रचार सभा, नामपल्ली में आयोजित कादंबिनी क्लब, हैदराबाद की मासिक संगोष्ठी में प्रो. ऋषभ देव शर्मा और डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा द्वारा संपादित पुस्तक 'अँधेरे में : पुनर्पाठ' का लोकार्पण समारोह संपन्न होगा। इसकी अध्यक्षता डॉ. अहिल्या मिश्र करेंगी तथा मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. शुभदा वांजपे पुस्तक को लोकार्पित करेंगी। प्रथम प्रति प्रो. गोपाल शर्मा स्वीकार करेंगे। 

कादंबिनी क्लब की अध्यक्ष डॉ.  अहिल्या मिश्र ने बताया कि गजानन माधव मुक्तिबोध की कविता 'अँधेरे में' की अर्धशती हैदराबाद में 2015 में मनाई गई थी। यह पुस्तक उसकी अगली कड़ी है।

यह पुस्तक दो खंडों में विभाजित है। पहले खंड में तेरह शोधपूर्ण आलेख शामिल हैं जो महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के प्रो. देवराज, अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय के पूर्व आचार्य डॉ. एम. वेंकटेश्वर, विख्यात कवि और समीक्षक डॉ. दिविक रमेश, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. राजमणि शर्मा और दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के पूर्व आचार्य डॉ. ऋषभ देव शर्मा जैसे दिग्गजों के साथ डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा, डॉ. साहिराबानू बी. बोरगल, डॉ. गोरखनाथ तिवारी, डॉ. बलविंदर कौर, डॉ. मृत्युंजय सिंह और डॉ. बी. बालाजी ने लिखे हैं।

विमोच्य पुस्तक के दूसरे खंड में प्रो. गोपाल शर्मा की पूरी एक पुस्तक प्रस्तुत की गई है। ‘अँधेरे में : देरिदा-दृष्टि से एक जगत समीक्षा’ नामक इस पुस्तक में पहली बार उत्तर आधुनिक विमर्शकार देरिदा की वैचारिकी की कसौटी पर ‘अँधेरे में’ का पाठ विश्लेषण किया गया है।

!! इस महत्वपूर्ण पुस्तक के लोकार्पण समारोह में आप सादर आमंत्रित हैं!!

स्वागतोत्सुक:
गुर्रमकोंडा नीरजा

मंगलवार, 4 जुलाई 2017

(पुस्तक) 'अँधेरे में' : पुनर्पाठ @ मुक्तिबोध-शताब्दी-संदर्भ

'अँधेरे में'' : पुनर्पाठ/ (सं) ऋषभ देव शर्मा, गुर्रमकोंडा नीरजा
परिलेख प्रकाशन, नजीबाबाद
2017, पृष्ठ 224, मूल्य : 250/- 
ISBN : 978-93-84068-54-7
वितरक : srisahitiprakashan@yahoo.com







आज अर्थात 4 जुलाई, 2017 को प्रो. ऋषभ देव शर्मा ऑफिशियली साठ वर्ष के अर्थात 'सीनियर सिटिजन' हो रहे हैं. यह सुखद संयोग है कि आज ही उनके साथ संपादित चिरप्रतीक्षित पुस्तक 'अँधेरे में : पुनर्पाठ' प्रकाशित होकर आई है. मुझे विश्वास है कि सर इसे देखकर प्रसन्न और गदगद होंगे. मुक्तिबोध की रचना 'अँधेरे में' की अर्धशती के अवसर पर सर ने इस किताब का सपना देखा था और उसे साकार करने की जिम्मेदारी मुझे सौंप दी थी. सहयोगी विद्वानों की कृपा से अब मुक्तिबोध की जन्म शती के वर्ष में वह सपना साकार हुआ है. इसमें विविध लेखों के अलावा प्रो. गोपाल शर्मा की एक पूरी किताब भी शामिल है. हम यह पुस्तक 'त्वदीयं वस्तु गोविंद तुभ्यमेव समर्पये' की तर्ज पर प्रो. गोपाल शर्मा जी को ही समर्पित कर रहे हैं.
                                                                   - गुर्रमकोंडा नीरजा  
 


भूमिका

यह वर्ष (2017) आधुनिक भारतीय कविता के एक शलाका पुरुष गजानन माधव मुक्तिबोध (1917-1964) का जन्म-शताब्दी वर्ष है. उनके निधन को, और उनकी कालजयी कृति ‘अँधेरे में’ के प्रकाशन को, भी पचास वर्ष से अधिक बीत चुके हैं. इन्हीं दोनों संदर्भों को ध्यान में रखते हुए हम विनम्रतापूर्वक यह पुस्तक (‘अँधेरे में’ : पुनर्पाठ) आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं. बार-बार कहा जाता रहा है कि मुक्तिबोध ‘कठिन समय के कठिन कवि’ हैं और खास तौर से ‘अँधेरे में’ अपनी वैचारिकता और शिल्पगत नवीनता के कारण जटिल कविता है – न उसका कोई पूर्वज है और न वंशज. आलोचकों की फतवेबाजी ने एक ऐसा रहस्यलोक इस कवि और कविता के इर्दगिर्द बुन दिया है कि 20 वीं शताब्दी की इस एक श्रेष्ठ अभिव्यक्ति के निकट जाता हुआ पाठक इस तरह डरता है मानो उसे अँधेरे में किसी ब्रह्मराक्षस के पास जाना पड़ रहा हो. 

तरह-तरह की विचारधाराओं में दीक्षित होकर इस कृति और कृतिकार को समझने की कोशिश करना रेनकोट पहनाकर स्नान का आनंद लेने का पाखंड है. हमारा मानना है कि कठिन परिस्थितियों और संश्लिष्ट अनुभूतियों से घिरे होने के बावजूद मुक्तिबोध और ‘अँधेरे में’ – दोनों ही बेहद कोमल और सरल हैं. उतने ही कोमल और सरल जितना रिमझिम बरसता हुआ सावन. जटिलता उत्पन्न हुई है अपरिचय के कारण. अपरिचय है पहले से अर्जित दीक्षा के कारण. इस दीक्षा के रेनकोट को उतार दें तो मुक्तिबोध की दुनिया हमें हमारी अपनी दुनिया लगने लगती है. इस दुनिया को देखने के, झेलने के, भोगने के, जीने के और इससे लड़ने और इसे बदलने के अनेक कोण हो सकते हैं. ये कोण हमारी स्थिति पर निर्भर करते हैं कि हम महाकाव्यात्मक चेतना के इस कवि और काव्य को कहाँ से और कैसे देख रहे हैं. यहीं से’अँधेरे में’ कविता के अलग-अलग पाठों की संभावनाओं के दरीचे खुलते हैं. यह पुस्तक मुक्तिबोध के ‘अँधेरे में’ के प्रवाह में डूबकर इसके गर्भ में निहित प्रकाश बीजों के पहचान करने का एक यत्न भर है. आइए, आप भी इसमें गोता लगाइए. 

इस पुस्तक में एक प्रयोग भी शामिल है. वह यह कि इसमें अंतिम आलेख के रूप में पूरी एक पुस्तक शामिल की गई है – प्रो. गोपाला शर्मा द्वारा लिखित अँधेरे में : देरिदा-दृष्टि से एक जगत-समीक्षा – जिसे इस पुस्तक के लिए ही विशेष रूप से लिखा गया है. हम प्रो. गोपाल शर्मा सहित सभी सहयोगी लेखकों और परिलेख प्रकाशन के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त करते हैं. 

होली : 13 मार्च, 2017                                                                                                                                         
      - संपादक द्वय 

रविवार, 2 अप्रैल 2017

हिंदी और उर्दू की साझी विरासत : अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न


हिंदी और उर्दू की साझी विरासत : अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न
30 और 31 मार्च, 2017 को मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी, हैदराबाद में ‘’हिंदी और उर्दू की साझी विरासत’’ विषयक दो-दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न हुई। आज के संदर्भ में जहां धर्म और मज़हब के नाम पर देश को बांटने की बात हो रही है, यह संगोष्ठी एकता के बिंदुओं को उजागर करने के संकल्प के साथ आरंभ हुई । प्रतिष्ठित कथाकार  नासिरा शर्मा ने रिबन काटकर संगोष्ठी का उद्घाटन किया । आरंभ में  सांप्रदायिक सद्भाव  पर आधारित कुछ फिल्मों की क्लिपिंग प्रदर्शित की गई और मानू का तराना पेश किया गया। हिंदी विभाग के प्रभारी अध्यक्ष मो.खालिद मुबश्शीर उज़-ज़फ़र ने मेहमानों का स्वागत किया। संयोजक डॉ. करन सिंह ऊटवाल ने संगोष्ठी का परिचय देते हुए कहा कि भाषा और मज़हब को तोड़ने वालों की बात का जिक्र न करें, उनको तवज्जो न दें क्योंकि  हमें जोड़ने वालों की बात करनी है । यूनिवर्सिटी ऑफ नार्थ कैरोलिना, चैपल हिल्स, अमेरिका के एशियाई अध्ययन विभाग के प्राध्यापक डॉ.जॉन शील्ड कॉल्डवेल  ने कहा कि दोनों भाषाओं को शुद्धता की ओर ले जाना, उन्हें अशुद्ध करना है । उसी विश्वविद्यालय के  डॉ. अफरोज ताज ने कहा कि भारत और पाकिस्तान से बाहर निकलें तो हिंदी उर्दू एक ही भाषा है । जेएनयू के प्रोफेसर नसीर अहमद खान ने कहा कि हिंदी उर्दू को अलग करने की साजिश फोर्ट विलियम कॉलेज में रची गई थी । आज इन दोनों भाषाओं के मिले-जुले रूप में इतनी शक्ति है कि हम एक हो जाएँ तो यह सार्क देशों की संपर्क भाषा बन सकती है । नासिरा शर्मा ने कहा कि हिंदी और उर्दू मेरी दो माँ हैं । हिंदी की ओर हिंदी टीचर ने आकर्षित किया और पिताजी की विरासत को समझने के लिए बाद में मैंने उर्दू सीखी । प्रो. असगर वजाहत ने कहा कि हालांकि भारत का संविधान हिंदी और उर्दू को अलग-अलग भाषाएं मानता हैं, लेकिन भाषावैज्ञानिक मानते हैं कि ये 2 भाषाएं अलग-अलग लिपियों में लिखी जाने वाली एक ही भाषा है  जिसका व्याकरण एक है । मानू के कुलपति प्रो. मोहम्मद असलम परवेज़ ने कहा कि हिंदी और उर्दू अलग नहीं हैं  बल्कि मिलकर उसे  आगे बढ़ना है ,तभी वह अपने उद्देश्यों को पूरा कर सकती है ।उन्होंने दोनों लिपियों में लिखी  गई रचनाओं के अनुवाद को एक अभियान के रूप में चलाने पर जोर दिया।
हिंदी साहित्य के मुस्लिम लेखक : गंगा-जमुनी तहज़ीब
उद्घाटन सत्र के पश्चात मुख्य सत्र के साथ-साथ दो समानांतर सत्रों का भी आयोजन किया गया। प्रथम मुख्य सत्र का विषय था हिंदी साहित्य के मुस्लिम लेखक : गंगा-जमुनी तहज़ीब जिसकी अध्यक्षता प्रो. ऋषभदेव शर्मा  ने की। प्रमुख वक्ता थे डॉ. अलीम अशरफ जायसी, डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा, डॉ .समीना ताबिश, डॉ. चंदू खंडारे, डॉ.सोनाली मेहता और डॉ. शेषु बाबु आदि। साथ ही तीन समानांतर सत्र चले जिनकी  अध्यक्षता प्रो. मोहन सिंह, प्रो.शकीला खानम और  डॉ. प्रभाकर त्रिपाठी ने की। वक्ता रहे डॉ.सुषमा देवी ,डॉ. सुभाष कुमार शर्मा ,डॉ. कामेश्वरी, प्रियंका कुमारी, हरबंस कौर ,डॉ. अली, डॉ. अर्चना झा, अपर्णा चतुर्वेदी, गीतांजलि साहू, थे डॉ. अफसर उन्निसा बेगम, डॉ. जमील अहमद  तथा अनिल आदि।  
उर्दू साहित्य के गैरमुस्लिम लेखक : गंगा-जमुनी तहज़ीब
दूसरे मुख्य सत्र का विषय रहा उर्दू साहित्य के गैरमुस्लिम लेखक : गंगा-जमुनी तहज़ीब। इसकी अध्यक्षता प्रो.असगर वजाहत ने की और  प्रमुख वक्ता थे  डॉ.महमूद काज़मी, अमरनाथ, मोहम्मद शाहिद आदि। समानांतर सत्र की अध्यक्षता प्रो. अबुल कलाम ने की जिसके प्रमुख वक्ता थे अंसार अहमद, सुभाष कुमार, मोहम्मद नेहाल अफरोज़ तथा रुकैया नबी आदि ।
कविसम्मलेन-मुशायरा
पहले दिन की शाम कवि सम्मेलन और मुशायरे के नाम रही। इसकी अध्यक्षता डॉ. अहिल्या मिश्र ने की। प्रो. ऋषभदेव शर्मा, प्रवीण प्रणव, नरेंद्र राय, डॉ. महमूद काज़मी, डॉ. अफरोज़ ताज, डॉ.अक़ील हाशमी, सरदार सलीम, कोकब ज़क़ी. समी सिद्दीकी, इबरार खान, आसिफ चिराग राजा ने सांप्रदायिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता पर केंद्रित कवितायेँ प्रस्तुत कर श्रोताओं को मुग्ध कर दिया।
दोनों भाषाओं में लिखने वाले लेखक : गंगा-जमुनी तहज़ीब
दूसरे दिन चले संगोष्ठी के तीसरे प्रमुख सत्र का केंद्रीय विषय रहा- दोनों भाषाओं में लिखने वाले लेखक : गंगा-जमुनी तहज़ीब इसकी अध्यक्षता नासिरा शर्मा ने की और  प्रमुख वक्ता थे डॉ.अफरोज ताज नकवी, जॉन शील्ड काल्डवेल, डॉ. शम्शुल हूदा, डॉ.जी.वी. रत्नाकर, डॉ.पठान रहीम खान, डॉ.असलम परवेज, एफ.एम. सलीम तथा कहकशाँ लतीफ। समानांतर सत्रों  की अध्यक्षता प्रो.नसीमुद्दीन फरीस और डॉ वसीम बेगम ने की । वक्ता थे डॉ. मंजु शर्मा, डॉ.प्रोमिला, डॉ.निखत जहां ,अजय ,खुशबू, डॉ.तबस्सुम बेगम ,डॉ.वाजदा इशरत, डॉ. हिना कौसर, शेख अब्दुल गनी, डॉ. पी. जयलक्ष्मी तथा चिराग राजा आदि ।
गंगा-जमुनी तहज़ीब पर प्रमुख विद्वानों के विचार
चौथा सत्र था- गंगा-जमुनी तहज़ीब पर प्रमुख विद्वानों के विचार इस सत्र की अध्यक्षता प्रो.रोहिताश्व  ने की। चर्चा आरंभ करते हुए डॉ. अनीस आज़मी ने कहा कि शब्दों में सबसे अधिक ताकत होती है तथा मिली-जुली संस्कृति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आजमगढ़ में किसी घर में बच्चे का जन्म होता तो कन्हैया जी जन्म लेले जैसा गाना गाया जाता था । उन्होंने  मिली-जुली संस्कृति के लिए नाटक  तथा थिएटर के योगदान पर प्रकाश डाला  । प्रो. वहाब क़ैसर ने मौलाना आज़ाद के व्यक्तित्व को केंद्र में रखकर हिंदू मुस्लिम एकता पर प्रकाश डाला तथा भाषा की महत्ता को बताते हुए राष्ट्रीय एकता और संस्कृति पर अपने विचार रखे। डॉ. आनंद राज वर्मा ने दक्कन की गंगा-जमुनी तहज़ीब पर प्रकाश डाला। जिंदगी के अपने तजुर्बों को साझा करते हुए मिली जुली संस्कृति से अवगत कराया तथा हैदराबादी संस्कृति के माध्यम से मिली-जुली संस्कृति पर प्रकाश डाला। लक्ष्मी देवी राज ने मज़हब से बढ़कर इंसानियत को तवज्जो दी। अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए हिंदू मुस्लिम साझी संस्कृति पर प्रकाश डाला और मातृभाषा की अहमियत को बताया । डॉ. असलम फरशोरी  ने गंभीरता से बात करते हुए कहा कि आज के राजनीतिक हालात में हमारी सांप्रदायिक सद्भाव से बनी तहज़ीब कहीं खो गई है जिसमें हम  हर स्तर पर एक साथ मिलकर रहते थे।  प्रो. रोहिताश्व  ने अध्यक्षीय भाषण में विस्तारपूर्वक विभिन्न लेखकों तथा उनकी रचनाओं के उदाहरण देते हुए गंगा-जमुनीतहज़ीब पर प्रकाश डाला और ज्ञानवर्धक चर्चा करके विषय अनुकूल ज्ञान की सीमा का परिष्कार किया ।
समापन समारोह
मानू के अकादमिक डीन प्रो. रवींद्रन की अध्यक्षता में समापन सत्र संपन्न हुआ।  इसके आरंभ में अमेरिका से आए अफरोज ताज नकवी ने अपने गीत तथा जॉन शील्ड कॉल्डवेल  ने अपने हारमोनियम से महफिल में समा बांध दिया । प्रो असगर वजाहत, प्रो. नसीर अहमद खान तथा नासिरा शर्मा ने संगोष्ठी पर सकारात्मक  प्रतिक्रिया व्यक्त की। संगोष्ठी की रिपोर्ट संयोजक डॉ .करन सिंह ऊटवाल ने पेश की तथा धन्यवाद ज्ञापन  सह-संयोजक डॉ.शम्शुल हुदा ने प्रस्तुत किया। सामूहिक जन-गण-मन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।
[रिपोर्ट एवं  चित्र सौजन्य :  डॉ. करन  सिंह ऊटवाल ]

मंगलवार, 7 मार्च 2017

डॉ. ऋषभदेव शर्मा ‘अंतरराष्ट्रीय साहित्य गौरव सम्मान’ से अलंकृत

 राजेंद्र भवन ट्रस्टनई दिल्ली में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मान समारोह के अवसर पर
प्रो. ऋषभदेव शर्मा को "अंतरराष्ट्रीय साहित्य गौरव सम्मान" ग्रहण करते हुए श्रीलंका में भारत की उच्चायुक्त डॉ.प्रज्ञा सिंह, जे. एस. विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. हरिमोहन तथा  युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच के अध्यक्ष रामकिशोर उपाध्याय। साथ में, आशीष भारद्वाज एवं पीयूष भारद्वाज। 
 

रूसी-भारतीय मैत्री संघ – दिशा (मास्को), हिंदी संस्थान – कुरुनेगल (श्रीलंका), सामाजिक संस्था – पहल (दिल्ली) और साहित्यक-सांस्कृतिक शोध संस्था (मुंबई) के संयुक्त तत्वावधान में दीनदयाल मार्ग, दिल्ली स्थित राजेंद्र भवन न्यास के सभाकक्ष में ‘अंतरराष्ट्रीय सम्मान समारोह’ का संक्षिप्त लेकिन भव्य आयोजन संपन्न हुआ. समारोह की अध्यक्षता जे. एस. विश्वविद्यालय, उत्तर प्रदेश के कुलपति प्रो. हरिमोहन ने की तथा संचालन उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, हैदराबाद के पूर्व अध्यक्ष प्रो.ऋषभदेव शर्मा ने किया.

  
मुख्य अतिथि के रूप में साहित्य गंगा, मुंबई के अध्यक्ष डॉ. योगेश दुबे मंचासीन हुए जिन्हें अंतरराष्ट्रीय हिंदी शलाका सम्मान से अलंकृत किया गया. प्रो. हरिमोहन को अंतरराष्ट्रीय हिंदी रत्नाकर सम्मान, हैमबर्ग विश्वविद्यालय - जर्मनी से आए डॉ. रामप्रसाद भट्ट को अंतरराष्ट्रीय हिंदी भास्कर सम्मान, साठ्ये महाविद्यालय – मुंबई के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. प्रदीप कुमार सिंह को अंतरराष्ट्रीय हिंदी मित्र सम्मान, श्रीलंका में भारत की उच्चायुक्त डॉ. प्रज्ञा सिंह को अंतरराष्ट्रीय साहित्य और भाषा सम्मान तथा हैदराबाद के वरिष्ठ समीक्षक एवं कवि प्रो. ऋषभदेव शर्मा को अंतरराष्ट्रीय साहित्य गौरव सम्मान प्रदान किए गए. अन्य सम्मानित विभूतियों में देश के विभिन्न अंचलों से पधारे चालीस से अधिक हिंदीसेवी और साहित्यकार सम्मिलित हैं.


इस अवसर पर अलंकृत विभूतियों के सम्मान में देशी-विदेशी सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए गए. विशेषतः रूस से आई हुईं किशोर नृत्यांगनाओं मारिया और वोल्गा द्वारा दो रूसी लोक नृत्य-गीतों की जीवंत प्रस्तुति ने सभी आगंतुकों को मंत्रमुग्ध कर दिया. मगध विश्वविद्यालय के आचार्य डॉ. विनय कुमार के धन्यवाद-ज्ञापन और सामूहिक राष्ट्रगान के साथ कार्यक्रम समाप्त हुआ.