बुधवार, 12 जुलाई 2017

(निमंत्रण) मुक्तिबोध जन्मशती पर प्रकाशित "अँधेरे में : पुनर्पाठ" का लोकार्पण 16 जुलाई को

'अँधेरे में'' : पुनर्पाठ/ (सं) ऋषभ देव शर्मा, गुर्रमकोंडा नीरजा
परिलेख प्रकाशन, नजीबाबाद
2017, पृष्ठ 224, मूल्य : 250/- 
ISBN : 978-93-84068-54-7
वितरक : srisahitiprakashan@yahoo.com
हैदराबाद।16 जुलाई, 2017 (रविवार) को दोपहर 12 बजे हिंदी प्रचार सभा, नामपल्ली में आयोजित कादंबिनी क्लब, हैदराबाद की मासिक संगोष्ठी में प्रो. ऋषभ देव शर्मा और डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा द्वारा संपादित पुस्तक 'अँधेरे में : पुनर्पाठ' का लोकार्पण समारोह संपन्न होगा। इसकी अध्यक्षता डॉ. अहिल्या मिश्र करेंगी तथा मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. शुभदा वांजपे पुस्तक को लोकार्पित करेंगी। प्रथम प्रति प्रो. गोपाल शर्मा स्वीकार करेंगे। 

कादंबिनी क्लब की अध्यक्ष डॉ.  अहिल्या मिश्र ने बताया कि गजानन माधव मुक्तिबोध की कविता 'अँधेरे में' की अर्धशती हैदराबाद में 2015 में मनाई गई थी। यह पुस्तक उसकी अगली कड़ी है।

यह पुस्तक दो खंडों में विभाजित है। पहले खंड में तेरह शोधपूर्ण आलेख शामिल हैं जो महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के प्रो. देवराज, अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय के पूर्व आचार्य डॉ. एम. वेंकटेश्वर, विख्यात कवि और समीक्षक डॉ. दिविक रमेश, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. राजमणि शर्मा और दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के पूर्व आचार्य डॉ. ऋषभ देव शर्मा जैसे दिग्गजों के साथ डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा, डॉ. साहिराबानू बी. बोरगल, डॉ. गोरखनाथ तिवारी, डॉ. बलविंदर कौर, डॉ. मृत्युंजय सिंह और डॉ. बी. बालाजी ने लिखे हैं।

विमोच्य पुस्तक के दूसरे खंड में प्रो. गोपाल शर्मा की पूरी एक पुस्तक प्रस्तुत की गई है। ‘अँधेरे में : देरिदा-दृष्टि से एक जगत समीक्षा’ नामक इस पुस्तक में पहली बार उत्तर आधुनिक विमर्शकार देरिदा की वैचारिकी की कसौटी पर ‘अँधेरे में’ का पाठ विश्लेषण किया गया है।

!! इस महत्वपूर्ण पुस्तक के लोकार्पण समारोह में आप सादर आमंत्रित हैं!!

स्वागतोत्सुक:
गुर्रमकोंडा नीरजा

मंगलवार, 4 जुलाई 2017

(पुस्तक) 'अँधेरे में' : पुनर्पाठ @ मुक्तिबोध-शताब्दी-संदर्भ

'अँधेरे में'' : पुनर्पाठ/ (सं) ऋषभ देव शर्मा, गुर्रमकोंडा नीरजा
परिलेख प्रकाशन, नजीबाबाद
2017, पृष्ठ 224, मूल्य : 250/- 
ISBN : 978-93-84068-54-7
वितरक : srisahitiprakashan@yahoo.com







आज अर्थात 4 जुलाई, 2017 को प्रो. ऋषभ देव शर्मा ऑफिशियली साठ वर्ष के अर्थात 'सीनियर सिटिजन' हो रहे हैं. यह सुखद संयोग है कि आज ही उनके साथ संपादित चिरप्रतीक्षित पुस्तक 'अँधेरे में : पुनर्पाठ' प्रकाशित होकर आई है. मुझे विश्वास है कि सर इसे देखकर प्रसन्न और गदगद होंगे. मुक्तिबोध की रचना 'अँधेरे में' की अर्धशती के अवसर पर सर ने इस किताब का सपना देखा था और उसे साकार करने की जिम्मेदारी मुझे सौंप दी थी. सहयोगी विद्वानों की कृपा से अब मुक्तिबोध की जन्म शती के वर्ष में वह सपना साकार हुआ है. इसमें विविध लेखों के अलावा प्रो. गोपाल शर्मा की एक पूरी किताब भी शामिल है. हम यह पुस्तक 'त्वदीयं वस्तु गोविंद तुभ्यमेव समर्पये' की तर्ज पर प्रो. गोपाल शर्मा जी को ही समर्पित कर रहे हैं.
                                                                   - गुर्रमकोंडा नीरजा  
 


भूमिका

यह वर्ष (2017) आधुनिक भारतीय कविता के एक शलाका पुरुष गजानन माधव मुक्तिबोध (1917-1964) का जन्म-शताब्दी वर्ष है. उनके निधन को, और उनकी कालजयी कृति ‘अँधेरे में’ के प्रकाशन को, भी पचास वर्ष से अधिक बीत चुके हैं. इन्हीं दोनों संदर्भों को ध्यान में रखते हुए हम विनम्रतापूर्वक यह पुस्तक (‘अँधेरे में’ : पुनर्पाठ) आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं. बार-बार कहा जाता रहा है कि मुक्तिबोध ‘कठिन समय के कठिन कवि’ हैं और खास तौर से ‘अँधेरे में’ अपनी वैचारिकता और शिल्पगत नवीनता के कारण जटिल कविता है – न उसका कोई पूर्वज है और न वंशज. आलोचकों की फतवेबाजी ने एक ऐसा रहस्यलोक इस कवि और कविता के इर्दगिर्द बुन दिया है कि 20 वीं शताब्दी की इस एक श्रेष्ठ अभिव्यक्ति के निकट जाता हुआ पाठक इस तरह डरता है मानो उसे अँधेरे में किसी ब्रह्मराक्षस के पास जाना पड़ रहा हो. 

तरह-तरह की विचारधाराओं में दीक्षित होकर इस कृति और कृतिकार को समझने की कोशिश करना रेनकोट पहनाकर स्नान का आनंद लेने का पाखंड है. हमारा मानना है कि कठिन परिस्थितियों और संश्लिष्ट अनुभूतियों से घिरे होने के बावजूद मुक्तिबोध और ‘अँधेरे में’ – दोनों ही बेहद कोमल और सरल हैं. उतने ही कोमल और सरल जितना रिमझिम बरसता हुआ सावन. जटिलता उत्पन्न हुई है अपरिचय के कारण. अपरिचय है पहले से अर्जित दीक्षा के कारण. इस दीक्षा के रेनकोट को उतार दें तो मुक्तिबोध की दुनिया हमें हमारी अपनी दुनिया लगने लगती है. इस दुनिया को देखने के, झेलने के, भोगने के, जीने के और इससे लड़ने और इसे बदलने के अनेक कोण हो सकते हैं. ये कोण हमारी स्थिति पर निर्भर करते हैं कि हम महाकाव्यात्मक चेतना के इस कवि और काव्य को कहाँ से और कैसे देख रहे हैं. यहीं से’अँधेरे में’ कविता के अलग-अलग पाठों की संभावनाओं के दरीचे खुलते हैं. यह पुस्तक मुक्तिबोध के ‘अँधेरे में’ के प्रवाह में डूबकर इसके गर्भ में निहित प्रकाश बीजों के पहचान करने का एक यत्न भर है. आइए, आप भी इसमें गोता लगाइए. 

इस पुस्तक में एक प्रयोग भी शामिल है. वह यह कि इसमें अंतिम आलेख के रूप में पूरी एक पुस्तक शामिल की गई है – प्रो. गोपाला शर्मा द्वारा लिखित अँधेरे में : देरिदा-दृष्टि से एक जगत-समीक्षा – जिसे इस पुस्तक के लिए ही विशेष रूप से लिखा गया है. हम प्रो. गोपाल शर्मा सहित सभी सहयोगी लेखकों और परिलेख प्रकाशन के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त करते हैं. 

होली : 13 मार्च, 2017                                                                                                                                         
      - संपादक द्वय 

रविवार, 2 अप्रैल 2017

हिंदी और उर्दू की साझी विरासत : अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न


हिंदी और उर्दू की साझी विरासत : अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न
30 और 31 मार्च, 2017 को मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी, हैदराबाद में ‘’हिंदी और उर्दू की साझी विरासत’’ विषयक दो-दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न हुई। आज के संदर्भ में जहां धर्म और मज़हब के नाम पर देश को बांटने की बात हो रही है, यह संगोष्ठी एकता के बिंदुओं को उजागर करने के संकल्प के साथ आरंभ हुई । प्रतिष्ठित कथाकार  नासिरा शर्मा ने रिबन काटकर संगोष्ठी का उद्घाटन किया । आरंभ में  सांप्रदायिक सद्भाव  पर आधारित कुछ फिल्मों की क्लिपिंग प्रदर्शित की गई और मानू का तराना पेश किया गया। हिंदी विभाग के प्रभारी अध्यक्ष मो.खालिद मुबश्शीर उज़-ज़फ़र ने मेहमानों का स्वागत किया। संयोजक डॉ. करन सिंह ऊटवाल ने संगोष्ठी का परिचय देते हुए कहा कि भाषा और मज़हब को तोड़ने वालों की बात का जिक्र न करें, उनको तवज्जो न दें क्योंकि  हमें जोड़ने वालों की बात करनी है । यूनिवर्सिटी ऑफ नार्थ कैरोलिना, चैपल हिल्स, अमेरिका के एशियाई अध्ययन विभाग के प्राध्यापक डॉ.जॉन शील्ड कॉल्डवेल  ने कहा कि दोनों भाषाओं को शुद्धता की ओर ले जाना, उन्हें अशुद्ध करना है । उसी विश्वविद्यालय के  डॉ. अफरोज ताज ने कहा कि भारत और पाकिस्तान से बाहर निकलें तो हिंदी उर्दू एक ही भाषा है । जेएनयू के प्रोफेसर नसीर अहमद खान ने कहा कि हिंदी उर्दू को अलग करने की साजिश फोर्ट विलियम कॉलेज में रची गई थी । आज इन दोनों भाषाओं के मिले-जुले रूप में इतनी शक्ति है कि हम एक हो जाएँ तो यह सार्क देशों की संपर्क भाषा बन सकती है । नासिरा शर्मा ने कहा कि हिंदी और उर्दू मेरी दो माँ हैं । हिंदी की ओर हिंदी टीचर ने आकर्षित किया और पिताजी की विरासत को समझने के लिए बाद में मैंने उर्दू सीखी । प्रो. असगर वजाहत ने कहा कि हालांकि भारत का संविधान हिंदी और उर्दू को अलग-अलग भाषाएं मानता हैं, लेकिन भाषावैज्ञानिक मानते हैं कि ये 2 भाषाएं अलग-अलग लिपियों में लिखी जाने वाली एक ही भाषा है  जिसका व्याकरण एक है । मानू के कुलपति प्रो. मोहम्मद असलम परवेज़ ने कहा कि हिंदी और उर्दू अलग नहीं हैं  बल्कि मिलकर उसे  आगे बढ़ना है ,तभी वह अपने उद्देश्यों को पूरा कर सकती है ।उन्होंने दोनों लिपियों में लिखी  गई रचनाओं के अनुवाद को एक अभियान के रूप में चलाने पर जोर दिया।
हिंदी साहित्य के मुस्लिम लेखक : गंगा-जमुनी तहज़ीब
उद्घाटन सत्र के पश्चात मुख्य सत्र के साथ-साथ दो समानांतर सत्रों का भी आयोजन किया गया। प्रथम मुख्य सत्र का विषय था हिंदी साहित्य के मुस्लिम लेखक : गंगा-जमुनी तहज़ीब जिसकी अध्यक्षता प्रो. ऋषभदेव शर्मा  ने की। प्रमुख वक्ता थे डॉ. अलीम अशरफ जायसी, डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा, डॉ .समीना ताबिश, डॉ. चंदू खंडारे, डॉ.सोनाली मेहता और डॉ. शेषु बाबु आदि। साथ ही तीन समानांतर सत्र चले जिनकी  अध्यक्षता प्रो. मोहन सिंह, प्रो.शकीला खानम और  डॉ. प्रभाकर त्रिपाठी ने की। वक्ता रहे डॉ.सुषमा देवी ,डॉ. सुभाष कुमार शर्मा ,डॉ. कामेश्वरी, प्रियंका कुमारी, हरबंस कौर ,डॉ. अली, डॉ. अर्चना झा, अपर्णा चतुर्वेदी, गीतांजलि साहू, थे डॉ. अफसर उन्निसा बेगम, डॉ. जमील अहमद  तथा अनिल आदि।  
उर्दू साहित्य के गैरमुस्लिम लेखक : गंगा-जमुनी तहज़ीब
दूसरे मुख्य सत्र का विषय रहा उर्दू साहित्य के गैरमुस्लिम लेखक : गंगा-जमुनी तहज़ीब। इसकी अध्यक्षता प्रो.असगर वजाहत ने की और  प्रमुख वक्ता थे  डॉ.महमूद काज़मी, अमरनाथ, मोहम्मद शाहिद आदि। समानांतर सत्र की अध्यक्षता प्रो. अबुल कलाम ने की जिसके प्रमुख वक्ता थे अंसार अहमद, सुभाष कुमार, मोहम्मद नेहाल अफरोज़ तथा रुकैया नबी आदि ।
कविसम्मलेन-मुशायरा
पहले दिन की शाम कवि सम्मेलन और मुशायरे के नाम रही। इसकी अध्यक्षता डॉ. अहिल्या मिश्र ने की। प्रो. ऋषभदेव शर्मा, प्रवीण प्रणव, नरेंद्र राय, डॉ. महमूद काज़मी, डॉ. अफरोज़ ताज, डॉ.अक़ील हाशमी, सरदार सलीम, कोकब ज़क़ी. समी सिद्दीकी, इबरार खान, आसिफ चिराग राजा ने सांप्रदायिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता पर केंद्रित कवितायेँ प्रस्तुत कर श्रोताओं को मुग्ध कर दिया।
दोनों भाषाओं में लिखने वाले लेखक : गंगा-जमुनी तहज़ीब
दूसरे दिन चले संगोष्ठी के तीसरे प्रमुख सत्र का केंद्रीय विषय रहा- दोनों भाषाओं में लिखने वाले लेखक : गंगा-जमुनी तहज़ीब इसकी अध्यक्षता नासिरा शर्मा ने की और  प्रमुख वक्ता थे डॉ.अफरोज ताज नकवी, जॉन शील्ड काल्डवेल, डॉ. शम्शुल हूदा, डॉ.जी.वी. रत्नाकर, डॉ.पठान रहीम खान, डॉ.असलम परवेज, एफ.एम. सलीम तथा कहकशाँ लतीफ। समानांतर सत्रों  की अध्यक्षता प्रो.नसीमुद्दीन फरीस और डॉ वसीम बेगम ने की । वक्ता थे डॉ. मंजु शर्मा, डॉ.प्रोमिला, डॉ.निखत जहां ,अजय ,खुशबू, डॉ.तबस्सुम बेगम ,डॉ.वाजदा इशरत, डॉ. हिना कौसर, शेख अब्दुल गनी, डॉ. पी. जयलक्ष्मी तथा चिराग राजा आदि ।
गंगा-जमुनी तहज़ीब पर प्रमुख विद्वानों के विचार
चौथा सत्र था- गंगा-जमुनी तहज़ीब पर प्रमुख विद्वानों के विचार इस सत्र की अध्यक्षता प्रो.रोहिताश्व  ने की। चर्चा आरंभ करते हुए डॉ. अनीस आज़मी ने कहा कि शब्दों में सबसे अधिक ताकत होती है तथा मिली-जुली संस्कृति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आजमगढ़ में किसी घर में बच्चे का जन्म होता तो कन्हैया जी जन्म लेले जैसा गाना गाया जाता था । उन्होंने  मिली-जुली संस्कृति के लिए नाटक  तथा थिएटर के योगदान पर प्रकाश डाला  । प्रो. वहाब क़ैसर ने मौलाना आज़ाद के व्यक्तित्व को केंद्र में रखकर हिंदू मुस्लिम एकता पर प्रकाश डाला तथा भाषा की महत्ता को बताते हुए राष्ट्रीय एकता और संस्कृति पर अपने विचार रखे। डॉ. आनंद राज वर्मा ने दक्कन की गंगा-जमुनी तहज़ीब पर प्रकाश डाला। जिंदगी के अपने तजुर्बों को साझा करते हुए मिली जुली संस्कृति से अवगत कराया तथा हैदराबादी संस्कृति के माध्यम से मिली-जुली संस्कृति पर प्रकाश डाला। लक्ष्मी देवी राज ने मज़हब से बढ़कर इंसानियत को तवज्जो दी। अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए हिंदू मुस्लिम साझी संस्कृति पर प्रकाश डाला और मातृभाषा की अहमियत को बताया । डॉ. असलम फरशोरी  ने गंभीरता से बात करते हुए कहा कि आज के राजनीतिक हालात में हमारी सांप्रदायिक सद्भाव से बनी तहज़ीब कहीं खो गई है जिसमें हम  हर स्तर पर एक साथ मिलकर रहते थे।  प्रो. रोहिताश्व  ने अध्यक्षीय भाषण में विस्तारपूर्वक विभिन्न लेखकों तथा उनकी रचनाओं के उदाहरण देते हुए गंगा-जमुनीतहज़ीब पर प्रकाश डाला और ज्ञानवर्धक चर्चा करके विषय अनुकूल ज्ञान की सीमा का परिष्कार किया ।
समापन समारोह
मानू के अकादमिक डीन प्रो. रवींद्रन की अध्यक्षता में समापन सत्र संपन्न हुआ।  इसके आरंभ में अमेरिका से आए अफरोज ताज नकवी ने अपने गीत तथा जॉन शील्ड कॉल्डवेल  ने अपने हारमोनियम से महफिल में समा बांध दिया । प्रो असगर वजाहत, प्रो. नसीर अहमद खान तथा नासिरा शर्मा ने संगोष्ठी पर सकारात्मक  प्रतिक्रिया व्यक्त की। संगोष्ठी की रिपोर्ट संयोजक डॉ .करन सिंह ऊटवाल ने पेश की तथा धन्यवाद ज्ञापन  सह-संयोजक डॉ.शम्शुल हुदा ने प्रस्तुत किया। सामूहिक जन-गण-मन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।
[रिपोर्ट एवं  चित्र सौजन्य :  डॉ. करन  सिंह ऊटवाल ]

मंगलवार, 7 मार्च 2017

डॉ. ऋषभदेव शर्मा ‘अंतरराष्ट्रीय साहित्य गौरव सम्मान’ से अलंकृत

 राजेंद्र भवन ट्रस्टनई दिल्ली में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मान समारोह के अवसर पर
प्रो. ऋषभदेव शर्मा को "अंतरराष्ट्रीय साहित्य गौरव सम्मान" ग्रहण करते हुए श्रीलंका में भारत की उच्चायुक्त डॉ.प्रज्ञा सिंह, जे. एस. विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. हरिमोहन तथा  युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच के अध्यक्ष रामकिशोर उपाध्याय। साथ में, आशीष भारद्वाज एवं पीयूष भारद्वाज। 
 

रूसी-भारतीय मैत्री संघ – दिशा (मास्को), हिंदी संस्थान – कुरुनेगल (श्रीलंका), सामाजिक संस्था – पहल (दिल्ली) और साहित्यक-सांस्कृतिक शोध संस्था (मुंबई) के संयुक्त तत्वावधान में दीनदयाल मार्ग, दिल्ली स्थित राजेंद्र भवन न्यास के सभाकक्ष में ‘अंतरराष्ट्रीय सम्मान समारोह’ का संक्षिप्त लेकिन भव्य आयोजन संपन्न हुआ. समारोह की अध्यक्षता जे. एस. विश्वविद्यालय, उत्तर प्रदेश के कुलपति प्रो. हरिमोहन ने की तथा संचालन उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, हैदराबाद के पूर्व अध्यक्ष प्रो.ऋषभदेव शर्मा ने किया.

  
मुख्य अतिथि के रूप में साहित्य गंगा, मुंबई के अध्यक्ष डॉ. योगेश दुबे मंचासीन हुए जिन्हें अंतरराष्ट्रीय हिंदी शलाका सम्मान से अलंकृत किया गया. प्रो. हरिमोहन को अंतरराष्ट्रीय हिंदी रत्नाकर सम्मान, हैमबर्ग विश्वविद्यालय - जर्मनी से आए डॉ. रामप्रसाद भट्ट को अंतरराष्ट्रीय हिंदी भास्कर सम्मान, साठ्ये महाविद्यालय – मुंबई के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. प्रदीप कुमार सिंह को अंतरराष्ट्रीय हिंदी मित्र सम्मान, श्रीलंका में भारत की उच्चायुक्त डॉ. प्रज्ञा सिंह को अंतरराष्ट्रीय साहित्य और भाषा सम्मान तथा हैदराबाद के वरिष्ठ समीक्षक एवं कवि प्रो. ऋषभदेव शर्मा को अंतरराष्ट्रीय साहित्य गौरव सम्मान प्रदान किए गए. अन्य सम्मानित विभूतियों में देश के विभिन्न अंचलों से पधारे चालीस से अधिक हिंदीसेवी और साहित्यकार सम्मिलित हैं.


इस अवसर पर अलंकृत विभूतियों के सम्मान में देशी-विदेशी सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए गए. विशेषतः रूस से आई हुईं किशोर नृत्यांगनाओं मारिया और वोल्गा द्वारा दो रूसी लोक नृत्य-गीतों की जीवंत प्रस्तुति ने सभी आगंतुकों को मंत्रमुग्ध कर दिया. मगध विश्वविद्यालय के आचार्य डॉ. विनय कुमार के धन्यवाद-ज्ञापन और सामूहिक राष्ट्रगान के साथ कार्यक्रम समाप्त हुआ. 



सोमवार, 20 फ़रवरी 2017

डॉ. रामनिवास साहू की आत्मकथा 'मुझे कुछ कहना है' लोकार्पित


हैदराबाद, 19 फरवरी, 2017.
कादंबिनी क्लब के तत्वावधान में रविवार  को श्रीकृष्णदेवराय सभागार में प्रो. ऋषभ देव शर्मा की अध्यक्षता में क्लब की 295वीं मासिक गोष्ठी आयोजित की गई जिसमें मैसूर से पधारे डॉ. रामनिवास साहू की आत्मकथा  ‘मुझे कुछ कहना है’ के प्रथम भाग तथा क्लब द्वारा प्रकाशित  'पुष्पक -33’ का लोकार्पण संपन्न हुआ.

क्लब अध्यक्षा डॉ. अहिल्या मिश्र एवं कार्यकारी संयोजिका मीना मुथा ने प्रेस विज्ञप्ति में बताया कि इस अवसर पर डॉ. गोपाल शर्मा (मुख्य अतिथि एवं पुस्तक लोकार्पणकर्ता ), डॉ. शकुंतला रेड्डी (विशेष अतिथि), डॉ. रामनिवास साहू (लेखक, क्षेत्रीय निदेशक, केंद्रीय हिंदी संस्थान, मैसूर) और डॉ. अहिल्या मिश्र मंचासीन हुए. सर्वप्रथम दीप प्रज्वलन कर माँ शारदा का आशीष लिया गया. शुभ्रा महंतो ने निराला रचित सरस्वती वन्दना ‘वर दे वीणावादिनी वर दे’ की सुमधुर प्रस्तुति दी. डॉ. मिश्र ने स्वागत भाषण में संस्था की संक्षिप्त जानकारी व अतिथियों का परिचय दिया तथा मैसूर के रचनाकार डॉ. साहू का इस मंच पर आना क्लब के लिए गौरव की बार बताया. इस अवसर पर मंचासीन अतिथियों का क्लब की ओर से सम्मान किया गया. डॉ. रमा द्विवेदी और सरिता सुराणा ने व्यवस्था में सहयोग प्रदान किया.

प्रथम सत्र में महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के रचना संसार पर केंद्रित चर्चा सत्र में अपने विचार रखते हुए प्रो. ऋषभ देव शर्मा ने कहा कि निराला का जन्म बंगाल के मेदिनीपुर जिले में हुआ तथा बसंत पंचमी को अपनी जन्मतिथि मनाना उन्होंने खुद ही तय किया. गुलामी के युग में अपनी संस्कृति के प्रति गहरा लगाव जगाने का कार्य निरालाजी ने किया. उन्होंने विषयवस्तु और शिल्प दोनों ही दृष्टि से हिंदी कविता को एक नया आयाम दिया. हालांकि अधिक प्रसिद्धि उन्हें अपनी कविताओं से मिली लेकिन उनके लिखे उपन्यास और कहानियाँ भी हिंदी साहित्य में उतने ही महत्वपूर्ण हैं. ‘वर दे वीणावादिनी वर दे’ के अलावा उन्होंने कई और भक्ति गीत और प्रभातगीत लिखे. अध्यात्म से भी उनका जुड़ाव रहा, वे रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद से प्रभावित थे. प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने नौचंदी मेले में आयोजित कविसम्मेलन का जिक्र करते हुए निराला की पंक्तियों को उद्धृत किया.

डॉ. अहिल्या मिश्र ने कहा कि निराला ऐसे कवि हैं जिनकी रचनाओं को समेटते हुए 3 खंडों की पहले ग्रंथावली निकली और बाद में 13 खंडों में रचनावली निकली है. स्वाभिमानी निराला ने स्त्री विमर्श पर प्रमुखता से लेखन किया है. उनकी रचना ‘भिक्षुक’ और ‘वह तोड़ती पत्थर’ का डॉ. मिश्र ने पाठ किया.

डॉ. मदनदेवी पोकरणा ने ‘पुष्पक-33’ का परिचय देते हुए कहा कि सशक्त संपादकीय के साथ साथ विभिन्न साहित्य विधाओं से यह अंक सुसज्जित है. रचनाकारों का उल्लेख करते हुए उनकी कृतियों की संक्षिप्त समीक्षा करते हुए उन्होंने संपादक मंडल को साधुवाद दिया. डॉ रामनिवास साहू ने ‘पुष्पक-33’ को लोकार्पित किया.

द्वितीय सत्र में डॉ. रामनिवास साहू की आत्मकथा ‘मुझे कुछ कहना है’ [प्रथम भाग] को लोकार्पित करते हुए मुख्य अतिथि डॉ. गोपाल शर्मा ने अपने वक्तव्य में कहा कि इस किताब को पढ़ते समय पाठक सहसा इस कहानी में अपने आपको ढूंढने लगता है. यह उपन्यास अनेक विमर्शों का जाल है जो एक नहीं अपितु अनेक दृष्टियाँ ले कर चलता है. यहाँ बनवासी विमर्श पर प्रमुखता से बात की गई है. लेखक आज लिखते हुए पीछे मुड़कर देखता है तो पाता है कि आज भी कुछ भी नहीं बदला है. यह किताब बार-बार पढ़ने योग्य है. 

‘मुझे कुछ कहना है’ की समीक्षा करते हुए लक्ष्मी नारायण अग्रवाल ने कहा कि छत्तीसगढ़ी भाषा की आंचलिकता, बनवासी प्रथा, बनवासियों की जीवन शैली, उस कालखंड की परिस्थितियाँ आदि का सशक्त चित्रण इस पुस्तक में मौजूद है. इस रचना में चित्रित चरवाहे के पात्र को लक्ष्मी नारायण अग्रवाल ने सराहते हुए कहा कि अपने मैनेजमेंट और अर्थशास्त्री गुणों के बल पर उसने अपने गाँव को जिस तरह से सूखा पीड़ित होने से बचाया वह प्रेरणास्पद है. लेखक ने अपनी स्मरण शक्ति के बल पर काफी कुछ लिखा है और इस कृति को कहीं भी क्लिष्ट नहीं होने दिया है. ठाकुर, मुखिया, सौतेला व्यवहार, षड्यंत्र, शादी-ब्याह के समय होने वाले छल-कपट, प्रथा-कुप्रथा सब इस आत्मकथा में मौजूद हैं. आत्मकथा केवल मैं पर केन्द्रित नहीं है बल्कि इर्द गिर्द घूमते सभी किरदारों को भी उतना ही महत्त्व दिया गया है. ऐसा लेखन बहुत कम पढ़ने को मिलता है. अंग्रेजी शासन काल में जो स्थितियां थी आज भी उनमे कुछ ज्यादा बदलाव नहीं आया है. डॉ. साहू ने आत्मकथा विधा की सीमाओं में रहकर जो भी लिखा है, सराहनीय है, साहसिक है. 

डॉ. शकुंतला रेड्डी ने संस्था एवं डॉ. साहू को साधुवाद दिया. प्रवीण प्रणव ने कहा कि यह आत्मकथा आदि से अंत तक पाठकों को बांधे रखती है. कुछ प्रसंग बेहद ही भावपूर्ण लिखे गए हैं. डॉ.अहिल्या मिश्र ने कहा कि बहुत आसान है दूसरों पर हँसना पर बहुत कठिन है खुद पर हँसना, बहुत आसान है दूसरों पर लिखना पर बहुत कठिन है खुद पर लिखना. मेले, बाइस्कोप की यादों को टटोलते हुए स्त्री विमर्श पर सुन्दर बातें रखी गई है. यह आत्मकथा हर भारतीय की आम कहानी है. डॉ. साहू के लेखन ने फणीश्वरनाथ रेणु की याद दिला दी. लालटेन, दलदल, कीचड़, पहाड़ आदि का सुन्दर वर्णन है तथा पात्रों के सजीव वर्णन से सत्यता का जुड़ाव नज़र आता है. 

आत्म्कथाकार डॉ. रामनिवास साहू ने कहा कि मैं एक ऐसे बनवासी गाँव से आया हूँ जहाँ से पढ़कर कोई इस मुकाम पर पहुँचता है तो बहुत दुर्लभ उदाहरण के रूप में यह देखा जाएगा. इस सफ़र में मार्गदर्शन दे रहे सभी गुरुओं को वंदना. 238 देशों में हमारी भारतीयता फैली है परन्तु दुर्भाग्य है कि दिया तले अँधेरा. 'जिओ और जीने दो' का संदेश पहले भी हुआ करता था, आज भी है, लेकिन हालात सुधरने की बजाय बिगड़ते जा रहे हैं.

प्रो० ऋषभ देव ने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि मैंने डॉ. साहू से कहा था कि आप जिस अंचल से आते हैं उस पर कोई प्रामाणिक साहित्य उपलब्ध नहीं है और आपको अपनी आत्मकथा आंचलिक संस्कृति और आंचलिक जीवन के संघर्षों को उभारते हुए लिखनी चाहिए. डॉ. साहू ने इस चुनौती के अनुरूप बहुत स्पष्टता के साथ विशिष्ट देश-काल की घटनाओं का बहुत बेबाकी से चित्रण किया है. डॉ. शर्मा ने पुस्तक से कुछ अंशों पर प्रकाश डाला और इस आत्मकथा के 4 और भागों के प्रकाशन की योजना की सूचना दी. प्रो. शर्मा ने कहा कि वनवासी गाँवों का कोई लिखित इतिहास नहीं होता. मौखिक परंपरा के आधार पर यह खड़ा होता है. मेरा ‘मैं’ सबका ‘मैं’ बन जाए, यह रचनाकार की सफलता है जिस पर डॉ. साहू खरे उतरते हैं. अंचल के निर्माण, विकास और इस दौरान मनुष्य के संघर्ष का पुस्तक में बेहतर चित्रण है. आगे के खण्डों को पढ़ने की उत्सुकता बनी रहेगी.

इस अवसर पर डॉ. साहू ने मंचासीन विद्वानों को स्मृतिचिह्न के रूप में छात्रकोष की प्रति भेंट की. प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने डॉ. साहू का व ज्योतिनारायण ने डॉ. गोपाल शर्मा का व्यक्तिगत तौर पर सम्मान किया. लोकार्पण समारोह का संचालन प्रवीण प्रणव और मीना मुथा ने किया, डॉ. रमा द्विवेदी ने  धन्यवाद ज्ञापित किया.

समापन सत्र में ऋतुराज वसंत पर आधारित कवि गोष्ठी नरेंद्र राय की अध्यक्षता में हुई. प्रो० ऋषभदेव शर्मा, डॉ. रामनिवास साहू, अजित गुप्ता और डॉ.अहिल्या मिश्र मंचासीन हुए. भंवरलाल उपाध्याय के संचालन में भावना पुरोहित, सरिता गर्ग, डॉ. गीता जांगिड़, मंगला अभ्यंकर, सुषमा वैद्य, जी० परमेश्वर, दर्शन सिंह, सूरज प्रसाद सोनी, उमा सोनी, प्रवीण प्रणव, देविदास घोडके, ज्योति नारायण, श्रीमन्नारायण चारी ‘विराट’, एल. रंजना, दीपा ठाकर, डॉ. साहू, अजित गुप्ता, प्रो० ऋषभ देव शर्मा, डॉ. अहिल्या मिश्र और मीना मुथा ने काव्यपाठ किया. नरेन्द्र राय ने अध्यक्षीय काव्यपाठ किया. सुरेश जैन, देवा प्रसाद मायला, जुगल बंग जुगल, डॉ. जी० नीरजा, जी० कृष्णा राव, श्रीसाहिती, मधुकर मिश्र, भूपेंद्र मिश्र, डॉ. बुधप्रकाश सागर, डॉ. मिथिलेश सागर, डॉ. अनीता गांगुली, पवित्रा अग्रवाल, चन्द्र प्रताप सिंह, श्रुतिकांत भारती, शोभा महाबल आदि की उपस्थिति रही. मीना मुथा के आभार एवं सामूहिक राष्ट्रगान के साथ समारोह का समापन हुआ. 
[प्रस्तुति : कादंबिनी क्लब, हैदराबाद]

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

‘मुझे कुछ कहना है’ का लोकार्पण 19 फरवरी को ‘कादंबिनी क्लब’ में


हैदराबाद, 17 फरवरी, 2017.

कादंबिनी क्लब, हैदराबाद के तत्वावधान में रविवार दिनांक 19 फरवरी, 2017 को प्रातः 11.30 बजे सुलतान बाज़ार, हैदराबाद में दिलशाद प्लाजा के समीप स्थित श्रीकृष्णदेव राय सभागार में क्लब की 295वीं मासिक गोष्ठी एवं पुस्तक लोकार्पण समारोह का आयोजन किया जा रहा है.

इस अवसर पर अरबामिंच विश्वविद्यालय, इथियोपिया (पूर्वी अफ्रीका) के अंग्रेजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. गोपाल शर्मा बतौर मुख्य अतिथि मंचासीन होंगे तथा केंद्रीय हिंदी संस्थान, मैसूर के क्षेत्रीय निदेशक डॉ. राम निवास साहू की औपन्यासिक आत्मकथा ‘मुझे कुछ कहना है’ (प्रथम भाग) को लोकार्पित करेंगे. साथ ही, कादंबिनी क्लब द्वारा प्रकाशित ‘पुष्पक-33’ का लोकार्पण डॉ. राम निवास साहू के हाथों संपन्न होगा. लोकार्पित कृतियों का परिचय क्रमशः लक्ष्मी नारायण अग्रवाल और डॉ. मदनदेवी पोकरणा द्वारा दिया जाएगा. डॉ. अहिल्या मिश्र आशीर्वचन देंगी तथा डॉ. ऋषभ देव शर्मा अध्यक्षता करेंगे.

आरंभ में सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ पर संक्षिप्त चर्चा के साथ उनकी कविता का पाठ किया जाएगा तथा अंत में ऋतुराज वसंत के संदर्भ में विशिष्ट कविगोष्ठी होगी. विभिन्न सत्रों का संयोजन प्रवीण प्रणव, अवधेश कुमार सिन्हा, डॉ. रमा द्विवेदी, मीना मुथा एवं मंगला अभ्यंकर द्वारा किया जाएगा.

सभी साहित्यप्रेमियों से अनुरोध है कि समय पर उपस्थिति प्रदान कर समारोह को सफल बनाएँ.

[प्रस्तुति : कादंबिनी क्लब, हैदराबाद]

[पुस्तक] 'मुझे कुछ कहना है' : डॉ. राम निवास साहू



मुझे कुछ कहना है (आत्मकथा) / डॉ. राम निवास साहू/ 2017/
अनन्य प्रकाशन, ई-17, पंचशील गार्डन, नवीन शाहदरा, दिल्ली -110032/
 192 रुपए/ 395 पृष्ठ/ सजिल्द.


OOO

वनवासी विमर्श का  नया आयाम


डॉ. रामनिवास साहू मूलतः एक भाषा-अध्येता हैं. उन्होंने मुंडा भाषाओँ के अपने सर्वेक्षण के लिए पर्याप्त ख्याति अर्जित की है जिसका भौगोलिक क्षेत्र छतीसगढ़ रहा है. छतीसगढ़ से उनका लगाव स्वाभाविक है क्योंकि वह उनकी जन्मभूमि है तथा उसके सौंदर्य और विद्रूप के मिले-जुले अनुभवों ने उनके व्यक्तित्व को बनाया, निखारा और सँवारा है. उनके मानस में छतीसगढ़ का आंचलिक परिवेश और जीवन उसकी बोली-बानी के साथ निरंतर बजता रहता है. वे प्रायः बेचैन रहते हैं कि किस प्रकार इस अंचल की नई पीढ़ी को शिक्षा के प्रकाश के सहारे राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल किया जाए ताकि वह गरीबी, पिछड़ेपन और शोषण से मुक्त हो सके और सही अर्थ में प्रजातांत्रिक व्यवस्था का अंग बनकर विकास के लाभ अपने जन, ज़मीन और जंगल तक पहुँचा सके. यह बेचैनी ही उन्हें कथा और आत्मकथा लिखने के लिए प्रेरित करती है. 

अपनी औपन्यासिक आत्मकथा ‘’मुझे कुछ कहना है’’ में लेखक ने अपने बहाने छतीसगढ़ के वनवासी समुदायों की आंचलिक जीवनचर्या को उनकी आदिम जिजीविषा के संदर्भ में भली प्रकार उकेरा है. इस प्रक्रिया में सामने आने वाली वनवासी समुदायों के स्थापन-विस्थापन-पुनर्स्थापन की रोचक ऐतिहासिक कथा, वन के देवी-देवताओं की लोकगाथा, जनता और सत्ता के संबंध, शोषण और लोकोपकार की द्वंद्वात्मक उपस्थिति, पुरुषों की भोगवादी-वर्चस्ववादी प्रवृत्ति तथा स्त्रियों की लुटते-घुटते रहने की अनंत शोकांतिका इस आत्मकथा को वैयक्तिक निजता के द्वीप से निकालकर लोकमंगल के व्यापक कथ्य में परिणत कर देती है. 

हिंदी में वनवासी विमर्श को नया आयाम प्रदान करने वाली इस कृति के प्रणयन के लिए लेखक को भूरिशः साधुवाद! 


- प्रो. ऋषभदेव शर्मा 

पूर्व अध्यक्ष, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, 
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद केंद्र.

OOO

एक हाशियाकृत अंचल की छटपटाहट 


भारतवर्ष अपने वर्तमान स्वरूप में इतनी अधिक विविधताओं से भरा हुआ महादेश है कि इसमें सभ्यता की आदिम अवस्था से लेकर उत्तर आधुनिक अवस्था तक को एक साथ देखा जा सकता है. खास तौर पर यदि हम वनवासी समुदायों को निकट से देखें तथा उनके जीवन-संघर्ष को समझने का प्रयास करें तो कबीलाई सभ्यता से चलकर ग्राम सभ्यता और फिर नगर सभ्यता के विकास के विविध चरणों के लोक-इतिहास को सहज ही परिलक्षित कर सकते हैं. इसी के साथ, शिक्षा और विकास के समांतर मनुष्य के हाथ से रेत की तरह भोलेपन और आनंद की संपदा का फिसलते-रिसते जाना भी एक ऐसा विषम यथार्थ है जिसे नकारा नहीं जा सकता. वनवासी समुदाय प्रकृति के सामीप्य के बावजूद कई प्रकार की विसंगतियों के भी शिकार दिखाई देते हैं; आर्थिक-राजनैतिक शोषण तो है ही. 


‘’मुझे कुछ कहना है’’ शीर्षक अपनी औपन्यासिक आत्मकथा में डॉ. रामनिवास साहू ने इन सब सामाजिक परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में छत्तीसगढ़ के एक वनवासी अंचल के परिवेश, संघर्ष, सौंदर्य और विद्रूप को रेखांकित करने का सफल प्रयास किया है. लेखक ने इस अंचल को किसी जिज्ञासु पर्यटक या खोजी पत्रकार की दृष्टि से बाहर-बाहर से नहीं देखा है, बल्कि वह इस अंचल का निवासी होने के कारण इसके सारे सुख-दुःख का स्वयं भोक्ता है. अतः इसकी प्रामाणिकता असंदिग्ध है. सभ्यता की दौड़ में पीछे छोड़ दिए गए एक हाशियाकृत अंचल से संबद्ध लेखक के मन की छटपटाहट का एक कारण इस द्वंद्व में भी निहित दीखता है कि वह विकास तो चाहता है पर इसके लिए निसर्ग की बलि देना उसे स्वीकार नहीं. 

आशा है, साहित्य-जगत इस वनवासी विमर्श का स्वागत करेगा; इसमें शामिल होगा. 
 - प्रो. देवराज 

अधिष्ठाता, अनुवाद विद्यापीठ, 
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी वि.वि., वर्धा

सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

'अभिनव विमर्श' के लिए शोध-आलेख आमंत्रित



अभिनव विमर्श

(शोधपत्र संग्रह)
आईएसबीएन : 978-93-84068-50-9.
संपादक :
डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा
प्रायोजना निदेशक :  
डॉ. ऋषभदेव शर्मा
प्रकाशक :
परिलेख प्रकाशन, नजीबाबाद – 246763.
वितरक :
श्रीसाहिती प्रकाशन, हैदराबाद – 500048.


नियमावली

  1. ‘अभिनव विमर्श’  एक अव्यावसायिक और परस्पर सहयोग पर आधारित प्रायोजना है.
  2. ‘अभिनव विमर्श’ का प्रकाशन हिंदी भाषा और साहित्य के क्षेत्र में अभिनव अनुसंधान को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से किया जा रहा है.
  3. इसमें प्रतिष्ठित विद्वानों, प्राध्यापकों और आचार्यों के साथ-साथ हिंदी भाषा और साहित्य के क्षेत्र में अनुसंधानरत एम.फिल. और पीएच.डी. के शोधार्थी शामिल हो सकते हैं.
  4. इस प्रायोजना के अंतर्गत हिंदी भाषा और साहित्य के विविध क्षेत्रों से संबंधित शोधपत्र प्रकाशित किए जाएँगे.
  5. विद्वान/ शोधार्थी अपने शोधपत्र  संपादक को ईमेल द्वारा प्रेषित कर सकते हैं.
  6. संपादक का ईमेल पता है : srisahitiprakashan@yahoo.com
  7. शोधपत्र के साथ लेखक द्वारा मौलिकता का प्रमाणपत्र देना अनिवार्य है.  
  8. शोधपत्र अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप होने चाहिए तथा संदर्भ/ उद्धरण/ ग्रंथ सूची के लिए ‘APA स्टाइल’ का पालन अनिवार्य है.   
  9. प्रकाशनार्थ प्रेषित शोधपत्र अनिवार्यतः कृतिदेव 010 अथवा हिंदी यूनिकोड फॉण्ट में वर्ड फ़ाइल में ही टंकित होने चाहिए. अन्य किसी फॉण्ट या फोर्मेट में भेजे गए शोधपत्र विचारार्थ स्वीकार नहीं किए जाएँगे. पीडीएफ और स्कैन प्रतियाँ न भेजें.
  10. प्रकाशनार्थ प्रेषित शोधपत्र लगभग 3000 शब्दों के होने चाहिए.
  11. बहुत छोटे और बहुत बड़े शोधपत्र विचारार्थ स्वीकार नहीं किए जाएँगे.
  12. प्रकाशन के लिए प्राप्त आलेख ‘अभिनव विमर्श’ की विशेषज्ञ समिति के समक्ष रखे जाएँगे. समिति की स्वीकृति मिलने पर ही उन्हें प्रकाशन के लिए स्वीकार किया जाएगा.
  13. स्वीकार किए गए प्रत्येक शोधपत्र के प्रकाशन हेतु लेखक को 1000 रु. सहयोग राशि अग्रिम जमा करनी होगी.
  14. प्रकाशित होने पर ‘अभिनव विमर्श’ की 1000 रु. मूल्य की प्रतियाँ प्रत्येक सहयोगी लेखक को सादर भेंट की जाएँगी.
  15. शोधपत्र भेजने की अंतिम तिथि : 31 मार्च, 2017.

सोमवार, 6 फ़रवरी 2017

राजमहेंद्रवरम में प्रो. ऋषभदेव शर्मा का षष्ठिपूर्ति समारोह संपन्न



चित्र परिचय – 
1. शहनाई के साथ कल्याण मंडपम की ओर प्रस्थान. 2. गणेश वंदना : कुचिपुड़ी नृत्य.3. डॉ. ऋषभदेव शर्मा और डॉ. पूर्णिमा शर्मा : आसन पर.  4. प्रो. देवराज समीक्षात्मक उद्धरणों की दीवार का उद्घाटन करते हुए.  

5. डॉ. भागवतुल हेमलता कविता-पोस्टरों का उद्घाटन करते हुए.  6. वरमाला का आदान-प्रदान .
 7. ‘रामभक्ति काव्य का लोक पक्ष’ का समर्पण. 8. प्रो. देवराज का स्वागत-सत्कार. 

9. कुमार लव की काव्यकृति का समर्पण. 10. ‘तेलुगु साहित्य : एक अंतर्यात्रा’ प्रो. ऋषभदेव शर्मा को समर्पित. 11. प्रो. देवराज का अध्यक्षीय संबोधन. 12. प्रो. देवराज द्वारा प्रो. ऋषभदेव शर्मा की पुस्तक ‘कथाकारों की दुनिया’ का लोकार्पण.



राजमहेंद्रवरम, 29 जनवरी, 2017 (मीडिया विज्ञप्ति).

यहाँ आदित्य डिग्री कॉलेज, राजमहेंद्रवरम के सभाकक्ष में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के अधिष्ठाता प्रो. देवराज की अध्यक्षता में प्रतिष्ठित तेवरीकार, कवि, समीक्षक, हिंदीसेवी एवं शोध निर्देशक प्रो. ऋषभदेव शर्मा के षष्ठिपूर्ति समारोह का आयोजन भव्यतापूर्वक संपन्न हुआ. समारोह का संयोजन डॉ. पोलवरपु जयलक्ष्मी और डॉ. सिरिपुरपु तुलसी देवी ने किया. 

दक्षिण भारत में यह परंपरा है कि परिवार के वरिष्ठ जन अथवा गुरुजन की साठवीं वर्षगाँठ पर विशिष्ट समारोह करके उनके सुखद भविष्य की कामना की जाती है. इसके अंतर्गत सम्मानित वरिष्ठ जन का ‘कल्याणम’ और ‘कनकाभिषेकम’ करते हुए उनसे संबंधित स्मृतियों का बखान किया जाता है. इसी रीति के अनुसार प्रो. ऋषभदेव शर्मा और उनकी पत्नी डॉ. पूर्णिमा शर्मा का वैदिक विधि-विधान से ‘कल्याणम’ (विवाह) संपन्न कराया गया जिसके उपरांत उनके परिवारी जन के साथ संपूर्ण दक्षिण भारत के विविध अंचलों से आए हुए पूर्व छात्रों और शोधार्थियों ने उनका अभिनंदन किया. 

वाणीश्री के कुचिपुड़ी नृत्य तथा मोहम्मद आबिद की संगीतमय प्रस्तुतियों के अलावा डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा और प्रवीण प्रणव द्वारा निर्मित लघु फिल्म भी प्रदर्शित की गई. कुल 38 मिनट की इस लघुफिल्म में प्रो. शर्मा के जीवन, व्यक्तित्व और कृतित्व की रोचक अवं अंतरंग झांकी प्रस्तुत की गई. 

षष्ठिपूर्ति समारोह के द्वितीय सत्र में प्रो. ऋषभदेव शर्मा की विभिन्न काव्यकृतियों और समीक्षा पुस्तकों के उद्धरणों की पोस्टर-प्रदर्शनी भी तीन दीवारों पर प्रदर्शित की गई जिनका उद्घाटन प्रो. देवराज के साथ जयदीप मुखर्जी और डॉ भागवतुल हेमलता ने अलग अलग भाषाओं में हस्ताक्षर करके किया. 

तृतीय सत्र में प्रो. ऋषभदेव शर्मा की सद्यः प्रकाशित पुस्तक “कथाकारों की दुनिया” लोकार्पित की गई. साथ ही उन्हें समर्पित तीन अन्य ग्रंथों को भी लोकार्पित किया गया जिनमें डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा की साहित्य-इतिहास की पुस्तक “तेलुगु साहित्य : एक अंतर्यात्रा”, उत्तरआधुनिकतावादी कवि कुमार लव का कविता संग्रह “गर्भ में”, तथा पटना ,बिहार, की लेखिका डॉ. चंदन कुमारी का समीक्षाग्रंथ “राम भक्ति काव्य का लोकपक्ष” सम्मिलित हैं. 

अध्यक्षीय संबोधन में प्रो. देवराज ने कहा कि दक्षिण भारत आधुनिकता और परंपरा को एक साथ साध कर चलनेवाला सांस्कृतिक क्षेत्र है और यहाँ के हिंदी विद्वानों तथा छात्रों द्वारा जिस पारिवारिक आत्मीयता के साथ ऋषभदेव शर्मा की षष्ठिपूर्ति का उत्सव मनाया जा रहा है, वह आधुनिक समय में गुरु-शिष्य संबंध की अनुकरणीय मिसाल है. राष्ट्रगान के साथ समारोह का समापन हुआ. संचालन डॉ. रविचंद्र राव और डॉ. बी. बालाजी ने किया. 

बुधवार, 4 जनवरी 2017

युगीन चुनौतियों के संदर्भ में 'राग दरबारी' आज बहुत प्रासंगिक : राजीव त्रिवेदी

डॉ. ऋषभदेव शर्मा और डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा द्वारा संपादित 37 शोधपत्रों के संकलन 'अन्वेषी' (2016) का लोकार्पण 31 दिसंबर 2016 को  तिलक रोड, हैदराबाद स्थित तेलंगाना सारस्वत परिषद के सभागार में आयोजित श्रीलाल शुक्ल स्मारक राष्ट्रीय संगोष्ठी के अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में पधारे गृह विभाग, तेलंगाना सरकार के प्रधान सचिव राजीव त्रिवेदी आईपीएस के हाथों संपन्न हुआ.
समारोह की अध्यक्षता डॉ. अहिल्या मिश्र ने की तथा संयोजन डॉ. सीमा मिश्रा ने किया.
साथ में,  विशिष्ट अतिथि डॉ. गोपाल शर्मा तथा सम्माननीय अतिथि राजकुमार शुक्ल 'हंस' और अलका जैन, डॉ. बी. बालाजी,
डॉ. सुपर्णा बंद्योपाध्याय, डॉ. मंजु शर्मा , रूबी मिश्रा , अधिवक्ता अशोक तिवारी एवं अन्य.

श्रीलाल शुक्ल स्मारक राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं 
'अन्वेषी' का लोकार्पण समारोह संपन्न 


हैदराबाद, 1 जनवरी 2017. (मीडिया विज्ञप्ति).
      ‘’हिंदी एक ऐसी लचीली और उदार भाषा है जिसमें साहित्य और संस्कृति से लेकर मीडिया और बाज़ार तक को बाँध लेने की अद्भुत ताकत है. उसे यह ताकत व्यापक जनता और निष्ठावान साहित्यकारों से प्राप्त हुई है. हिंदी भाषा की इसी ताकत को पहचानकर श्रीलाल शुक्ल ने ‘राग दरबारी’ जैसा पूर्णतः व्यंग्यात्मक उपन्यास लिखा जो अपनी यथार्थपरकता के कारण आज भी युगीन चुनौतियों के संदर्भ में प्रासंगिक बना हुआ है. इसीलिए राजनीति और प्रशासन में कार्यरत हर व्यक्ति को ‘राग दरबारी’ अवश्य पढना चाहिए.’’ 

ये विचार यहाँ तिलक रोड स्थित तेलंगाना सारस्वत परिषद के सभागार में श्रीलाल शुक्ल स्मारक राष्ट्रीय संगोष्ठी समिति के तत्वावधान में संपन्न एक साहित्यिक समारोह का उद्घाटन करते हुए तेलंगाना सरकार गृह विभाग के प्रधान सचिव राजीव त्रिवेदी ने व्यक्त किए. इस अवसर पर उन्होंने डॉ. ऋषभदेव शर्मा और डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा द्वारा संपादित 37 शोधपत्रों के संकलन ‘अन्वेषी’ को भी लोकार्पित किया तथा युवा हिंदीसेवी डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा को ‘प्रथम श्रीलाल शुक्ल स्मारक सारस्वत सम्मान’ से अलंकृत किया. 

विगत 10 वर्षों से मूर्धन्य साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल के जन्मदिन पर आयोजित किए जाने वाले इस आयोजन की अध्यक्षता वरिष्ठ लेखिका डॉ. अहिल्या मिश्र ने की. इंदौर से आए राजकुमार शुक्ल ‘हंस’ और अलका जैन ने बतौर सम्माननीय अतिथि शिरकत की. आरभ में आकाश तिवारी ने शंखनाद और अर्चना पांडे ने मंगलाचरण किया. ‘अन्वेषी’ की प्रथम प्रति डॉ. देवेंद्र शर्मा और कवयित्री विनीता शर्मा ने स्वीकार की. 

डॉ. सीमा मिश्रा ने विषय प्रवर्तन किया और कहा कि श्रीलाल शुक्ल कथा और व्यंग्य के बड़े रचनाकार हैं तथा अपने गहरे सामाजिक सरोकार के नाते पाठक को गुदगुदाते हुए समय और समाज की करुण त्रासदी से इस तरह परिचित कराते हैं कि न रोते बनता है ,न हँसते. 

विशिष्ट अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए इथियोपिया के अरबामिंच विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग के आचार्य डॉ. गोपाल शर्मा ने श्रीलाल शुक्ल की रचनाओं के अंग्रेजी अनुवादों की चर्चा की तथा अरविंद अडिगा के बुकर पुरस्कृत अंग्रेजी उपन्यास ‘ द व्हाइट टाइगर’ से ‘राग दरबारी’ की तुलना करते हुए कहा कि ये कृतियाँ सामाजिक कलुष का चित्रण करने के बहाने हमें हमारे पतन की वास्तविकता से परिचित कराती हैं जो किसी भी व्यंग्यकार का प्रमुख लक्ष्य होता है. 

मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए डॉ. बी. बालाजी ने ‘’युगीन चुनौतियों के संदर्भ में श्रीलाल शुक्ल की रचनाधर्मिता’’ के विविध पहलुओं पर प्रकाश डाला और कहा कि ‘’श्रीलाल शुक्ल अपने ढंग के एक अनोखे रचनाकार हैं जिन्होंने व्यंग्य के माध्यम से राजनीति की विडंबनाओं को दिखाया। वे कथा की रोचकता के लिए जिन प्रसंगों को गढ़ते हैं, वे एक जैसे दिखते हुए भी अपनी अलग पहचाने बनाते हैं। व्यंग्य की धार उनके आरंभिक लेखन से विराम तक तेज होती गई है। उन्होंने नए कथ्य के लिए नए शिल्प गढ़े। उनकी रचनाप्रक्रिया और रचनाधर्मिता इसी से चरितार्थ हुई है। उनके साहित्य का कैनवस उनके विस्तृत जीवनानुभवों का संकलन है।‘’ 

सेंट एंस कॉलेज से संबद्ध डॉ. सुपर्णा बंद्योपाध्याय ने अपने शोधपत्र में रचनाकार की समकालीन, रचना में वर्णित युग की तथा वर्तमान युगीन सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनैतिक चुनौतियों की त्रि-आयामी कसौटी पर श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास ‘पहला पडाव’ तथा अन्य व्यंग्य रचनाओं की पड़ताल करते हुए बताया कि मूलतः व्यंग्यकार होने के कारण अपने समय की हर विकृति पर श्रीलाल शुक्ल की पैनी निगाह थी जिसके कारण वे अपनी रचनाओं में ऐसा देश-काल रच सके जो अनेक दशक बाद आज की युगीन चुनौतियों को भी संबोधित करने में समर्थ है. 

लोकार्पित पुस्तक ‘अन्वेषी’ की समीक्षा चिरेक इंटरनेशनल से संबद्ध डॉ. मंजु शर्मा ने की. उन्होंने बताया कि अविचारणीय मान लिए गए, हाशिए पर धकेले गए, हाशियों की सीमा में कैद समुदायों के विचारों की अभिव्यक्ति का मुख्य रूप से विश्लेषण करने वाली यह पुस्तक विस्तृत फलक पर साहित्य अध्ययन की दृष्टि से अंतर्विद्यावर्ती शोधकार्यों को प्रोत्साहित करती है जिसके अंतर्गत स्त्री विमर्श, अल्पसंख्यक विमर्श, वृद्धावस्था विमर्श और पर्यावरण विमर्श जैसे ज्वलंत विषयों पर लिखे गए शोधपत्र पाठकों तथा भावी शोधार्थियों के लिए दिशा निर्देशक हैं. 

समारोह का संचालन डॉ. सीमा मिश्रा ने किया. कार्यक्रम को सफल बनाने में अधिवक्ता अशोक तिवारी, वुल्ली कृष्णा राव, प्रवीण प्रणव, डॉ. पूर्णिमा शर्मा, डॉ. यशवंत जाधव, डॉ. सुस्मिता घोष, डॉ. जी. प्रवीणा राज, पवित्रा अग्रवाल, लक्ष्मी नारायण अग्रवाल, इंद्रजीत सिंह, नितिन पाटिल, संतोष विजय मुनेश्वर, विनोद चौरसिया, माधुरी तिवारी, आशा मिश्रा मुक्ता, बनवारी लाल मीना, प्रभा कुमारी, गहनी नाथ, रूबी मिश्रा, अनिल, गीता, भंवरलाल उपाध्याय आदि साहित्यप्रेमियों और हिंदीसेवियों की उपस्थिति का महत्वपूर्ण योगदान रहा. 



रविवार, 1 जनवरी 2017

विविध विमर्शों का शोधपूर्ण समावेश :‘अन्वेषी’


डॉ. ऋषभदेव शर्मा और डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा द्वारा संपादित 37 शोधपत्रों के संकलन 'अन्वेषी' (2016) का लोकार्पण 31 दिसंबर 2016 को  तिलक रोड, हैदराबाद स्थित तेलंगाना सारस्वत परिषद के सभागार में आयोजित श्रीलाल शुक्ल स्मारक राष्ट्रीय संगोष्ठी के अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में पधारे गृह विभाग, तेलंगाना सरकार के प्रधान सचिव राजीव त्रिवेदी आईपीएस के हाथों संपन्न हुआ.
समारोह की अध्यक्षता डॉ. अहिल्या मिश्र ने की तथा संयोजन डॉ. सीमा मिश्रा ने किया.
साथ में,  विशिष्ट अतिथि डॉ. गोपाल शर्मा तथा सम्माननीय अतिथि राजकुमार शुक्ल 'हंस' और अलका जैन, डॉ. बी. बालाजी,
डॉ. सुपर्णा बंद्योपाध्याय, डॉ. मंजु शर्मा , रूबी मिश्रा , अधिवक्ता अशोक तिवारी एवं अन्य.



विविध विमर्शों का शोधपूर्ण समावेश :‘अन्वेषी’ 

- डॉ. मंजु शर्मा , 
अध्यक्ष, हिंदी विभाग, 
चिरेक इंटरनेशनल, 
कोंडापुर, हैदराबाद (तेलंगाना)


['अन्वेषी' के लोकार्पण समारोह में प्रस्तुत समीक्षा]





पिछले कुछ वर्षों से यह महसूस किया जा रहा था कि हैदराबाद के हिंदी भाषा और साहित्य के शोधार्थियों और प्राध्यापकों को एक ऐसा मंच प्राप्त हो जिसके माध्यम से हमारे कार्य को हम प्रकाशित रूप में हिंदी जगत के समक्ष प्रस्तुत कर सकें. इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए ही एक सहयोगी प्रकाशन योजना के रूप में 2015 में ‘संकल्पना’ का संकल्प सामने आया. और अब उसके अगले सोपान के रूप में ‘अन्वेषी’ (2016) आपके सामने है. इस संकल्प को साकार करने का दायित्व स्वीकार किया हम सबकी परमप्रिय संपादक डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा जी ने. यह काम बड़े धीरज का है और सच्चाई यह है कि कोई भी ऐसे ’थैंक-लेस’ काम को करना नहीं चाहता; पर ये कर रही हैं, किए जा रही हैं क्योंकि इस योजना को प्रधान संपादक के रूप में डॉ. ऋषभदेव शर्मा जी की निरंतर प्रेरणा प्राप्त है. उम्मीद करती हूँ कि आज ही मैडम इस यात्रा के अगले सोपान की भी घोषणा करेंगी.

‘अन्वेषी’ (2016 ) विचारों-विश्लेषणों का विमर्श है, कहना अतिशयोक्ति न होगा. अविचारणीय मान लिए गए, हाशिए पर धकेले गए, हाशियों की सीमा में कैद समुदायों के विचारों की अभिव्यक्ति का मुख्य रूप से विश्लेषण करने वाली यह पुस्तक विस्तृत फलक पर साहित्य अध्ययन की दृष्टि से अंतर्विद्यावर्ती शोधकार्यों को प्रोत्साहित करती है जिसके अंतर्गत स्त्री विमर्श, अल्पसंख्यक विमर्श, वृद्धावस्था विमर्श और पर्यावरण विमर्श जैसे ज्वलंत विषयों पर लिखे गए शोधपत्र पाठकों तथा भावी शोधार्थियों के लिए दिशा निर्देशक भी हो सकते हैं.

‘अन्वेषी’ में वृद्धों के मनोजगत में होने वाले विचलन को महसूस किया जा सकता है. दलित जीवन की नारकीय स्थिति और स्त्री अभिव्यक्ति को भी रेखांकित किया गया है. इस पुस्तक में कविता विमर्श, भाषा विमर्श, कहानी विमर्श, उपन्यास विमर्श तथा मीडिया विमर्श पर भी शोधपरक आलेख हैं. 240 पृष्ठों के कलेवर में 7 खंड; तथा सात खंडों में 37 विषयों पर विचार विमर्श का अनोखा संगम.

‘हाशिया विमर्श’ में वृद्ध, दलित तथा स्त्री के जीवन में झाँका गया है . परिवार का वट वृक्ष जो स्वार्थ की कुल्हाड़ी की मार झेलता है! अपनों से अपनों के हाथों वृद्धों के मानस पटल पर होने वाले अत्याचार को शिवकुमार राजौरिया ने बख़ूबी पढ़ा है . यहाँ वृद्धों के मानसिक त्रास का दर्दभरा आभास मिलता है, इतना ही नहीं आज की पीढ़ी से सवाल करती वे बूढ़ी गद्मलाई आँखें कि समय तो सबका आता होगा .. खैर! झकझोर देती हैं . इन्हें कबाड़ की तरह एक कोने में फेंक दिया जाता है . वृद्ध परायेपन तथा अलगाव का शिकार हो रहे हैं .

हाशिया विमर्श की इसी कड़ी में जहाँ दलित जीवन की भयावहता और विवशता है वहीं स्त्री चेतना तथा उसकी अभिव्यक्ति को भी वाणी दी गई है जिसे टी. सुभाषिणी, डॉ. पोलवरपु जयलक्ष्मी, डॉ. सुरैया परवीन, डॉ. सुस्मिता घोष, उषा यादव, सुबोध कुमार सिंह (बेंगलूरु) और डॉ. अर्पणा दीप्ति ने बखूबी अंजाम दिया है. 

दूसरे खंड ‘भाषा विमर्श’ में हिंदी–मराठी भाषा की संरचना, भाषा विज्ञान के सामाजिक स्वरूप के साथ ही दक्खिनी भाषा के उद्भव और विकास पर चिंतन किया गया है . डॉ. मिलिंद पाटिल (वर्धा), डॉ. जोराम यालाम नाबाम (अरुणाचल प्रदेश) और डॉ. जी.प्रवीणा के ये शोधपत्र पारंपरिक और अधुनातन भाषाविज्ञान के शोधार्थियों के बड़े काम के हैं. 

तीसरे खंड ‘कविता विमर्श’ में साहित्य के कोमल रूप अर्थात काव्य का विश्लेषण शामिल है. सिरिपुरपु तुलसी देवी ने भक्तिकाव्य को प्रेम और सौंदर्य की खोज के लिए खंगाला है तो इंद्रजीत सिंह ने सूफ़ियाना अंदाज़ में प्रेमाख्यानों के वर्ण्य विषयों को स्पष्ट किया है . नितिन पाटिल रामविलास शर्मा की कविता के मार्क्सवादी तेवर को उभारते हैं, तो सुशील कुमार शैली (नाभा, पंजाब) कुमार विकल की कविताओं में अँधेरे और प्रकाश के द्वंद्व को बिंब-विश्लेषण के सहारे रेखांकित करते हैं. इसी खंड में अमन कुमार त्यागी ने डॉ. देवराज की राजनैतिक कविताओं में व्यंजित देश की समस्याओं तथा अकर्मण्यता पर खीज को चीन्हा है. पंद्रह राजनैतिक कविताओं का यह संक्षिप्त अवलोकन पाठक में उनकी कविताओं को पढ़ने की ललक जगाता है. 

कहानी तथा उपन्यास विमर्श विषयक खंडों में मानवाधिकार, आर्थिक संरचना, आंचलिकता, मनोविश्लेष्ण, पत्रकारिता, संस्कृति और सामाजिक यथार्थ की कथात्मक अभिव्यक्ति की नई दिशाओं की पहचान की गई है . डॉ. कोमल सिंह (नजीबाबाद), डॉ. एन. ललिता (कोयंबत्तूर), डॉ. अनुपमा तिवारी (विशाखपट्टनम), संतोष विजय मुनेश्वर, मोहम्मद माजिद मिया (दार्जिलिंग), समला देवी (दिल्ली), विनोद चौरसिया, माधुरी तिवारी, आशा मिश्रा ‘मुक्ता’ और डॉ. सुपर्णा मुखर्जी के साथ-साथ डॉ. ऋषभदेव शर्मा की उपस्थिति इसकी विशेषता है. ‘रंगभूमि’ और ‘गोदान’ जैसी कृतियों का वर्तमान संदर्भ में पुनर्पाठ सचमुच आँख खोलने वाला है.

छठे खंड मीडिया विमर्श में तीन शोधपत्र शामिल हैं. प्रतिष्ठित पत्रकार अरविंद कुमार सिंह (आजमगढ़), वर्षा कुमारी और डॉ. सुनीता जाजोदिया (चेन्नई) ने इन शोधपत्रों में क्रमशः गुंजेश्वरी प्रसाद, रामवृक्ष बेनीपुरी और तमिलनाडु की हिंदी पत्रकारिता पर खोजपूर्ण दृष्टि डाली है. 

इस पुस्तक के अंतिम खंड ‘विविधा’ में एक ओर तो डॉ. हर्षवर्धन सिंह (बिजनौर) ने वैदिक और स्मृतिकालीन नीति, न्याय, समाज तथा राजनीति की स्थितियों को रेखांकित किया है तथा दूसरी ओर प्रभाकुमारी और बनवारी लाल मीना ने भाषा और संस्कृति के संदर्भ में भारतीय शिक्षा नीतियों का विश्लेषण किया है. गहनीनाथ ने जानकीवल्लभ शास्त्री तथा आनंद कुमार यादव (बाँदा) ने रामविलास शर्मा के प्रदेय का मूल्यांकन किया है. यहीं डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा का शोधपत्र भी है – ‘आधुनिक तेलुगु साहित्य में रामकथा’, जिसमें विश्वनाथ सत्यनारायण, रंगनायकम्मा और ओल्गा की कृतियों का संदर्भ शामिल है. मैं महसूस करती हूँ कि उनका यह आलेख एक ब्लू-प्रिंट सरीखा है जिसमें आधुनिक राम-साहित्य संबंधी कई सारी शोध योजनाओं की संभावनाओं की ओर इशारा है – बशर्ते कि आप भारतीय साहित्य और तुलनात्मक अध्ययन के क्षेत्र में कुछ करना चाहते हों!

अब तक की चर्चा से आप समझ गए होंगे कि ‘अन्वेषी’ नाम की यह पुस्तक गागर में सागर भरने वाली कहावत को चरितार्थ करती है. इसमें अरुणाचल प्रदेश से लेकर चेन्नई तक के विविध विश्वविद्यालयों के अध्येता और अध्यापकों ने सहयोग किया है. सभी सम्मिलित लेखक एवं शोधार्थीगण बधाई के पात्र है जो इस दुर्लभ पुस्तक के सहयोगी रहे है . मैं आपको विश्वास दिलाती हूँ कि यह पुस्तक शोधार्थियों के लिए पथ प्रदर्शक का काम करने में समर्थ है . निश्चय ही यह संपादकद्वय प्रो. ऋषभदेव शर्मा जी और डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा जी के अथक परिश्रम, सूक्ष्म दृष्टिकोण तथा गहन ज्ञान का उत्कृष्ट परिणाम है . 



समीक्षित कृति : अन्वेषी / 
संपादक : डॉ. ऋषभदेव शर्मा एवं डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा / 
प्रकाशक : परिलेख प्रकाशन, वालिया मार्केट, 
निकट साहू जैन कॉलेज, कोतवाली मार्ग,नजीबाबाद – 246763/ 
 वितरक : श्रीसहिती प्रकाशन, हैदराबाद; मो. 09849986346./
 पृष्ठ : 240 / 
मूल्य : 250 रुपए.